Monday, June 14, 2010

This is the best rebuff I ever wrote:

Somewhere in 1988-89, I had received a card from a friend in NDA, with these words:

"रोना चाहता हूँ जी भर,
पर रुलाई घोंट लेता यह सोच
कि यह मोती जो गिरेंगे ज़मीन पर
मेरे नहीं, उनकी अमानत हैं"

He was a nice guy. Only not my kind. So had to get across the message without hurting him. This is what I wrote back:
आपके अश्कों के हम नहीं हैं हकदार
उनको बेकार न बहायिएगा
ये आंसू भी काम आयेंगे एक दिन
उनको यूं ही न गंवायिएगा
इन मोतियों को अपने आँचल में समेटने आएँगी कोई
उन्हें फिर आप क्या जवाब दीजियेगा?

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